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कलियुग में भक्ति काल

  • Jan 30
  • 2 min read

Updated: Feb 19


कलियुग के समय में अजीबोग़रीब भक्ति काल चल रहा था।


*भक्त १.०* अपने इष्ट भगवान का अंध भक्त था। भगवान तो भगवान होता है। इस भगवान ने कलियुग में भी इस तरह का अंध भक्त १.० को पाकर बेहद खुश था। भगवान उस भक्त १.० की हर छोटी छोटी इच्छाएँ पूरी कर रहा था। भगवान को भय था कहीं यह भक्त १.० भी उसे छोड ना जाए।


कलियुग में रेगिस्तान में स्थित भगवान के मंदिर में इस साल बहुत बर्फ़बारी हुई। कई महीनों तक भगवान के मंदिर के पट नहीं खुले।


भक्त १.० बहुत व्याकुल था। कई महीनो से अपने इष्ट भगवान का दर्शन नहीं हुआ। वो इंतज़ार कर रहा था की मौसम ठीक हो जाए। भगवान उससे ज्यादा व्याकुल था। क्योंकि भगवान भक्तों के बिना अधूरा है। और भक्त १.० उसका एक मात्र अंध भक्त था।


कुछ दिनों के बाद मौसम ठीक हुआ परंतु पट खोलने के लिए मदिर के पुजारी एवं प्रबंधन बहुत उत्सुक नहीं थे। वो कुछ दिन और इंतज़ार करना चाह रहे थे ।


लेकिन भक्त १.० एवं भगवान दोनो ही और इंतज़ार नहीं करना चाहते। भक्त १.० ने भगवान से कहा कुछ करिए। कोई रास्ता हो तो बताए ? भक्त १.० ने कहा मैं खुद आकर मंदिर का पट खोलूँगा ।


भगवान ने बहुत सोचा। अपने अंध भक्त के लिए उसे भगवान बनाने के अलावा कोई उपाय नहीं था। भगवान ने अपनी सारी शक्तियाँ भक्त १.० को हस्तांतरित कर दी। भगवान ने इस हस्तांतरण के पहले कोई नियम नहीं बताए की कैसे वापस भक्त १.० को वह शक्तियाँ लौटाए। क्योंकी भगवान अपने भक्त के लिए अंधा हो गया था।


भक्त १.० को सभी शक्तियाँ मिल गई। वह तुरंत मंदिर की ओर निकला। रास्ते में उसे अपनी असीमित शक्तियों का आभास हुआ। जैसे जैसे मंदिर की ओर बढ़ रहा था वैसे वैसे वो भगवान बनता गया। कुछ देर के बाद भक्त अपने आप को भगवान समझने लगा। फिर उसके पैर मंदिर के बजाय कहीं और चलने लगे।


मंदिर में भगवान १.० बेहद प्रतीक्षा में थे। यह सोच रहे थे कि बस भक्त आ ही रहा होगा। लेकिन भक्त भगवान बन गया, वो खुद अपने मंदिर बनाने निकला। और भगवान १.० कलियुग में भक्त के इंतज़ार में प्रतीक्षा में ही रह गए। *हे भगवान १.०*।


04.09.2021

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