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Hindi and Sanskrit

  • Nov 21, 2025
  • 6 min read

Updated: Feb 19

हाल ही में हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाए जाने के संबंध में बहुत सारी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा मानने में खासतौर पर दक्षिण भारतीय राज्यों के द्वारा, जहां हर राज्य की अपना खुद की भाषा है, वहां से हिंदी भाषा को अनिवार्य रूप से सीख में और बोलचाल में उपयोग करने के तारतम में काफी विरोध देखने को मिला है। केंद्र सरकार के द्वारा नवीन शिक्षा नीति के अंतर्गत हिंदी भाषा को द्वितीय भाषा के रूप में स्कूल शिक्षा पाठ्यक्रम में जोड़ने का इरादा है। जिसका विरोध दक्षिण भारत के राज्यों के कुछ हिस्सों से देखने को मिल रहा है।


दक्षिण भारत में मूल रूप से 4 प्रमुख भाषाओं का प्रभाव है - तेलुगू, तमिल, कन्नड़ एवं मलयालम। चारों भाषाएं अपने आप में अलग हैं और स्वतंत्र है जिनकी लिपि या व्याकरण अपने आप में अनोखी है। क्या दक्षिण भारत को हिंदी सीखने में या हिंदी बोलने में कोई तकलीफ है? मैं मूलतः तेलंगाना से हूँ और मेरी मातृभाषा तेलुगू है। मैंने अपने स्कूल में तेलुगू, अंग्रेजी के अलावा तृतीय भाषा के रूप में हिंदी सीखी है । मैंने यह तीनो भाषाएँ भारत सरकार के तीन-भाषा फार्मूला 1968 के अन्तर्गत आंध्र प्रदेश में लागु इस निति के अंतर्गत सीखी हैं ।


भाषा सीखने के लिए तीन-भाषा फार्मूला 1968 में राज्यों के परामर्श से भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा तैयार किया गया था। 1968 के राष्ट्रीय नीति प्रस्ताव में सूत्र के अनुसार जो हिंदी भाषी राज्यों और हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं में हिंदी, अंग्रेजी और आधुनिक भारतीय भाषा (गैर-हिंदी में क्षेत्रीय भाषाओं में से एक) के अध्ययन के लिए प्रदान किया गया था।


तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश में विशेष रूप से हिंदी के प्रति सद्भावना है और हिंदी सीखने के लिए लोग तत्पर है। तेलंगाना में जहां उर्दू बोली जाती है क्योंकि यहां पर निजाम राज्य का प्रभाव था और हैदराबाद एक कॉस्मोपॉलिटन शहर होने के नाते यहां मारवाड़ी समाज एवं गुजराती समाज का प्रभाव होने की वजह से भी हिंदी बोलने में और सीखने में लोगों की दिलचस्पी हमेशा रही है। मैं तेलंगाना के ह्रदय करीमनगर जिले से हूं जहां पर उर्दू और कुछ हद तक हिंदी बहुत अच्छे से बोली जाती है।


तत्कालीन आंध्र प्रदेश एवं वर्तमान तेलंगाना में हिंदी के प्रति कोई ख़ास विरोध नहीं है । मैं जहां तक समझता हूं कर्नाटक में भी हिंदी के प्रति खास कोई विरोध नहीं है । मैंने अभी देखा है की जिन लोगों ने हिंदी किसी कारणवश नहीं सीखी है या उन्हें स्कूल में पढ़ायी नहीं गयी थी वह कहते हैं कि हमने हिंदी नहीं सीखते हुए भूल की है । वर्तमान समय में जब रोजगार के लिए और खास तौर पर जब इंटरनेट का प्रभाव आने के पश्चात हिंदी हमारे जीवन का एक हिस्सा बन गयी है। फिर ऐसे में क्या हिंदी के प्रति लोगों का विरोध है? मैं जितना समझता हूँ, बिल्कुल नहीं है । कुछ हद तक अगर मैं तमिलनाडु की भी बात करूं तो लोग चाहते हैं कि हिंदी सीखें फिर समस्या कहां है?


आज भारतवर्ष में राष्ट्र के प्रति एवं देश के प्रति अपार प्रेम एवं एक इमोशनल तरीके से युवा जुड़ा हुआ है। दक्षिण भारत के राज्य और यहां के लोग चाहते हैं कि जितना हम हिंदी को पसंद करते हैं और सीखना चाहते हैं उतना ही हिंदी भाषी लोग और साथी भारतीय दक्षिण भारत की भाषाओं के प्रति भी अपना प्रेम व्यक्त करें। कहीं ना कहीं दक्षिण भारतीय महसूस करते हैं कि वह अपने काम के प्रति और एक भारतीय होने का गर्व के साथ जिस तरह से मानव संसाधन में अपना योगदान देते, भारतीय अर्थ व्यवस्था को मजबूत बनाए हैं, यह महसूस करते हैं कि भारत में ही वह दोयम दर्जे के नागरिक हैं। जब हम हिंदी को सहर्ष स्वीकार करते हुए अपने जीवन का एक हिस्सा बना रहे हैं तो ऐसे में दक्षिण भारत की भाषाओं के प्रति हिंदी भाषी साथी भारतीय को क्यों लगाव नहीं हो पा रहा है?


यहां पर इस इस बात की चर्चा करना जरूरी है कि क्यों ना जिस तरह से हिंदी भाषा को हम स्वीकार करते हुए सीख रहे हैं, अपने जीवन का हिस्सा बना रहे हैं और अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम और सद्भावना दिखा रहे हैं, क्यों न हिंदी भाषी राज्यों में एक दक्षिण भारतीय भाषा को भी या फिर पूर्व भारतीय भाषाओं को स्कूल शिक्षा पाठ्यक्रम में द्वितीय भाषा के रूप में सिखाएं जिससे वर्तमान भारत में जिस तरह से राष्ट्रवाद एवं राष्ट्र के प्रति प्रेम उपज रहा है वह और मजबूत होगा और वह और भारत के एक हिस्से को दूसरे हिस्से से जुड़ेगा । एक भ्राता को दूसरे भ्राता से आलिंगन कराएगा।


दक्षिण भारत की भाषाएं संस्कृत से उपजे हुए हैं । संस्कृत हम सबकी भाषाओं की माता है । ऐसे में दक्षिण भारत के राज्यों में हिंदी का प्रवेश संस्कृत माता के आंचल से होते हुए गुजरे तो निश्चित ही दक्षिण भारत के राज्य और दक्षिण भारतीय हिंदी को निश्चित ही अपनाएंगे। इसका तात्पर्य है क्यों ना संस्कृत भाषा को और प्रभावी बनाएं और क्यों ना संस्कृत और हिंदी दोनों भाषाओं को हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में साथ साथ पढ़ाए । जो संस्कृत जानता है वह भारत की किसी भी भाषा को आसानी से समझता है पहचान लेता है। किसी भी भारतीय और दक्षिण भारतीय व्यक्ति से कहा जाए कि आप संस्कृत सीखें तो कोई मना नहीं करेगा परंतु यह कहा जाए की आप हिंदी सीखें तो कहीं ना कहीं हिचकिचाहट होगी । यही कहेगा कि दूसरी भाषा को हमारे ऊपर थोपा जा रहा है, जबकि हिंदी दक्षिण भारतीय भाषाओं से अलग नहीं है । केवल और केवल राजनीतिक और अपनी व्यक्तिगत कारणों से लोग इस भाव को रखते हैं।


संस्कृत भाषा सभी भाषाओं की जन्मस्थली है । ऐसे में संस्कृत भाषा को माध्यम मनाते हुए हिंदी दक्षिण भारत में सिखायी जा सकती है। और वैसे ही जिसे संस्कृत आती है वह हिंदी हो बंगाली हो किसी भी भारतीय भाषा को सीखने में कोई दिक्कत नहीं आती है । और वैसे ही हिंदी भाषी व्यक्ति को संस्कृत के माध्यम से दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने में भी कोई समस्या नहीं आएगी । इसलिए इस पर विचार करना होगा कि किस तरह से भाषाओं का प्रभाव संपूर्ण भारत में किया जाए।


वर्तमान समय में जब इंटरनेट और खासतौर पर मोबाइल इंटरनेट का प्रभाव अत्यधिक बढ़ रहा है और जिस तरह से बिना लिखे ही केवल बोलने पर ही शब्द लिखित में तब्दील हो रहे हैं ऐसे में भारतीय भाषाओं का प्रभाव और बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में जब मोबाइल इंटरनेट के माध्यम से संस्कृति कला एंटरटेनमेंट इत्यादि हर व्यक्ति के मोबाइल तक पहुंच रहा है तो यहां भाषा का प्रभाव और बढ़ता जा रहा है । यहां तक कि भाषाओं से ज्यादा अब बोलियों पर भी ज्यादा प्रभाव पड़ रहा है और स्थानीय बोलियां और प्रबलता से उभर कर आ रहे हैं क्योंकि इसका लिखना अब और आसान हो गया है। भारतीय भाषाएं एवं उनकी बोलियां अब स्थानीय व्यक्ति के लिए सीखना लिखना और अब उसको अपने जीवन में उपयोग करना और आसान होता जा रहा है। ऐसे में क्यों न मोबाइल इंटरनेट को और प्रभावी बनाते हुए हर व्यक्ति को किसी न किसी रूप में भारतीय भाषाओं को सीखने का मौका मिलना चाहिए।


वर्तमान में भाषाएं और उनकी बोलियां कला संस्कृति एंटरटेनमेंट का एक उपयोगी माध्यम बन गया है। आज फिल्म चाहे किसी भी भाषा में बने अगर वह देखने लायक हैं और एक अच्छा फिल्म के रूप में उसकी पब्लिसिटी होती है तो लोग भाषा को छोड़कर, भाषा को भूलकर फिल्म देखना पसंद करते हैं । और मोबाइल में तो हर व्यक्ति के हाथ में एक थिएटर बना दिया है जिसमें वह किसी भी भाषा की फिल्म या ऐसा क्रिएटिव कंटेंट देख लेता है। आने वाले समय में तो ना केवल भारतीय भाषाएं बल्कि दुनिया के किसी भी भाषाएं जिसमें अच्छा कंटेंट हो और जो व्यक्ति के इंटरटेनमेंट के हिसाब से हो तो निश्चित ही वह ऐसा कंटेंट देखेगा सुनेगा।


ऐसे में अब भाषा का कोई बॉर्डर नहीं बचा है या फिर भाषा के लिए अब राज्य सीमित नहीं है। अब भाषाएं अपनी सीमाएं लांगते हुए अपने बॉर्डर क्रॉस करते हुए किसी भी राज्य-देश में प्रवेश कर रहे है । तो हमें भाषाओं के प्रति और सरल नीति, भाषाओं को सीखने के लिए भाषाओं को बोलने के लिए और भाषाओं में अपना जीवन जीने के लिए प्रेरित करने वाली बातें करना होगा। भाषाओं का विरोध करने वाले कम होते जा रहे हैं ।भाषाओं को सीखने के लिए ललक और भाषाएं सीखने से क्या सकारात्मक प्रभाव होंगे इसको बताने की आवश्यकता बहुत है।


भारत ऐसा देश है जहां पर भाषाएं, बोलियां, विविधता इतनी अधिक है कि कोई एक भाषा सीखने से काम नहीं चलने वाला । हमें अधिक से अधिक भाषाएं सीखनी समझनी होगी ताकि हम बेहतर संवाद कर सके । संवाद ही इंसान के बनावट का एक अविच्चिन्ह हिस्सा है। बिना संवाद इंसान अपूर्ण है और उसके जीवन को खतरा है । उसके अस्तित्व को खतरा है। ऐसे में संवाद केवल और केवल भाषा के माध्यम से ही हो सकता है। हमारा देश और यह मातृभूमि भाषाओं के माध्यम से जीवित है ।निश्चित ही भाषाओं का प्रभाव आने वाले समय में हमारे इस मातृभूमि के हर व्यक्ति को जोड़ता ही जाएगा। आइए हम सब मिलकर अपने भाषाओं को पहचाने और उन्हें सीखने का प्रयास करें ताकि हम एक बेहतर संवाद करने वाला भारतीय बने।


21.09.2019

 
 
 

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